इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फर्जी शैक्षिक प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी पाने वाले आबकारी सिपाहियों को राहत देने से इनकार करते हुए तीनों विशेष अपीलों को निराधार बता यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि “धोखाधड़ी और न्याय साथ नहीं चल सकते।” मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र की खंडपीठ ने जावेद खान, नजीब अली और मुश्ताक उल्लाह की विशेष अपीलों पर यह निर्णय दिया है।
मामला जावेद खान, नजीब अली और मुस्ताक उल्लाह की नियुक्ति से जुड़ा है, जिन्हें वर्ष 2010 में आबकारी सिपाही के पद पर नियुक्त किया गया था। बाद में जांच में सामने आया कि उन्होंने ‘अधिकारी परीक्षा’ का जो प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया था, वह फर्जी और अवैध है। इसके आधार पर उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं। इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। एकल पीठ ने भी याचियों को राहत देने से इंकार कर दिया। जिसके खिलाफ विशेष अपील दाखिल की गई। खंडपीठ ने कहा कि जांच में स्पष्ट हुआ कि संबंधित संस्थान में उस अवधि में कोई परीक्षा आयोजित ही नहीं हुई थी।
प्रस्तुत प्रमाणपत्र और अंकपत्र फर्जी एवं मनगढ़ंत पाए गए। फर्जी दस्तावेज के आधार पर मिली नियुक्ति कानून की नजर में शून्य मानी जाएगी। कोर्ट ने कहा कि यदि नियुक्ति धोखाधड़ी से प्राप्त की गई हो, तो ऐसी स्थिति में विभागीय जांच आवश्यक नहीं होती। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला भी दिया गया। अपीलकर्ताओं ने दलील दी थी कि ‘अधिकारी परीक्षा’ हाईस्कूल के समकक्ष थी, लेकिन कोर्ट ने कहा कि जब प्रमाणपत्र ही फर्जी है, तो उसकी समकक्षता का प्रश्न अप्रासंगिक हो जाता है।
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